एक पर्वत पर शिवजी का एक सुंदर मन्दिर था। यहाँ बहुत से लोग शिवजी की पूजा के लिए आते थे। उनमें दो भक्त एक ब्राह्मण और दूसरा एक भील, नित्य आने वालों में थे।
ब्राह्मण प्रतिदिन शिवजी का दूध से अभिषेक करता, उन पर फूल,पत्तियां चढ़ाता, गूगल जलाता और चंदन का लेप करता !
भील के पास तो ये सब वस्तुएं नही थी, सो वह हाथी के मदजल से शिवजी का अभिषेक करता, उन पर जंगल की फूल पत्तियां चढ़ाता और भक्तिभाव से शिवजी को रिझाने को नृत्य करता !
एक दिन ब्राह्मण जब मन्दिर गया तो उसने देखा भगवान शिव भील से बात कर रहे हैं !
ब्राह्मण को यह अच्छा नही लगा और तुरंत भगवान शिव से बोला- भगवन क्या आप मुझसे असंतुष्ट है ?
मै ऊंचे कुल में पैदा हुआ हूं तथा बहुमूल्य पदार्थो से आपकी पूजा करता हूं। जबकि यह भील नीच कुल से है और अपवित्र पदार्थों से आपकी उपासना करता है !
शिवजी ने कहा- ब्राह्मण तुम ठीक कहते हो, किन्तु इस भील का जितना स्नेह मुझ पर है उतना तुम्हारा नही !
एक दिन शिवजी ने अपनी एक आंख गिरा दी। ब्राह्मण नियत समय पर पूजा करने आया। उसने देखा शिवजी की एक आंख नही है। पूजा करके वह अपने घर लौट आया !
उसके बाद भील आया,उसने देखा भगवान शिव की एक आंख नही है। वो तुरंत अपनी आंख निकालने का प्रयास करने लगा !
तभी ब्राह्मण मन्दिर में पहुँच गया और भील को ऐसा करते देख तुरंत भगवान शिव के चरणों में लेट गया और भगवान शिव से कहने लगा- प्रभु ! आपका यही सच्चा भक्त हैं इसे रोको, ये नेत्रहीन हो जाएगा !
भगवान शिव बोले- तुमने ऐसा सोचा भी नही, इसलिए मैं कहता हूं कि भील ही मेरा सच्चा भक्त हैं !
भगवान शिव की कृपा से भील नेत्रहीन होने से भी बच गया और ब्राह्मण के अहंकार के नेत्र भी खुल गए !
ईश्वर केवल भावना के भूखे हैं। भावना शुद्ध होगी तो परमात्मा पीछे पीछे आ जाएंगे।
ॐ त्र्यंबकम यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम।
उर्वारुकमिव वंदना मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।
ॐ कर्पूरगौरं कारुणावतारं,
संसारसारं भुजगेंद्रहारम्।
सदावसन्तं हृदयारविंदे,
भवंभवानी साहितं नमामि।।
।। ॐ नमः शिवाय ।।
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