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Aglio Olio Pasta (अलियो ओलियो पास्ता) रेसिपी

Aglio Olio Pasta (अलियो ओलियो पास्ता) रेसिपी Aglio e Olio एक क्लासिक इटैलियन पास्ता है, जो बहुत कम सामग्री से बनता है — लहसुन, ऑलिव ऑयल और पास्ता। इसका स्वाद सिंपल लेकिन बहुत स्वादिष्ट होता है। सामग्री (2 लोगों के लिए) 200 ग्राम स्पेगेटी या कोई भी पास्ता 5–6 लहसुन की कलियाँ (पतली कटी हुई) 3–4 बड़े चम्मच ऑलिव ऑयल 1 छोटा चम्मच चिली फ्लेक्स नमक स्वादानुसार 1/2 छोटा चम्मच काली मिर्च 2 बड़े चम्मच पास्ता उबालने का पानी थोड़ा सा पार्सले या धनिया (गार्निश के लिए) वैकल्पिक: कद्दूकस किया हुआ चीज़ बनाने की विधि 1. पास्ता उबालें एक बड़े बर्तन में पानी उबालें। उसमें नमक और पास्ता डालें। पास्ता को पैकेट पर दिए समय तक “al dente” होने तक पकाएँ। थोड़ा सा उबला पानी अलग रख लें और बाकी पानी छान दें। 2. लहसुन भूनें पैन में ऑलिव ऑयल गर्म करें। उसमें कटे हुए लहसुन डालें। धीमी आँच पर हल्का गोल्डन होने तक भूनें। ध्यान रखें कि लहसुन जले नहीं। 3. मसाले डालें अब चिली फ्लेक्स और काली मिर्च डालें। 10–15 सेकंड चलाएँ। 4. पास्ता मिलाएँ उबला हुआ पास्ता पैन में डालें। साथ में 2–3 चम्मच पास्ता पानी डालें। अच्छे से टॉस क...

श्रीकालभैरव मदिरा अर्पण का रहस्य

 श्रीकालभैरव मदिरा अर्पण का रहस्य अनेक नगर, पुर तथा पुरियों का अवलोकन करते हुए हनुमान तथा नारद उज्जयिनी (उज्जैन) की शिप्रा नदी के तट पर बसी अवंतिकापुरी, जिसे उज्जयिनी या उज्जैन भी कहते हैं पहुँचे । यहां महाकालेश्वर नाम का ज्योतिर्लिंग है । वहां पहुंचकर दोनों ने सर्वप्रथम शिप्रा माता को प्रणाम किया और फिर स्नान करने के बाद पुरी में प्रवेश किया। सबसे पहले उन्हें श्रीकालभैरव जी का मंदिर मिला। अवंतिका के श्री कालभैरव मंदिर में जब महावीर हनुमान तथा देवर्षि नारद जी ने प्रवेश किया, तब वहां आरती हो रही थी। भक्त नाना प्रकार के वाद्य बजा रहे थे। कुछ भावुक जन ताली बजाते हुए उमंग में झूम रहे थे। प्रधान पुजारी जी 33 दीपों की आरती घुमा रहे थे। 11-11 दीपों की तीन प्रज्वलित पंक्तियां अत्यंत सुहानी लग रही थीं। आरती हो जाने पर पुजारी जी ने नीराजन का जल छिड़का। सब ने भक्तिपूर्वक अपने मस्तक झुकाकर उस जल को अपने तन पर पड़ने दिया और अपने को कृतार्थ माना। फिर सबने करबद्ध रूप में भगवान की स्तुति आरंभ की। श्रीकालभैरव जी की पूजन-आरती देखकर हनुमान जी और नारद जी अत्यंत आनंदित हुए। उन्होंने कुछ देर वहां रुकने का...

धार्मिक कर्मकांड में आसन पर बैठना आवश्यक क्यों?

 धार्मिक कर्मकांड में आसन पर बैठना आवश्यक क्यों? पूजा-पाठ, साधना, तपस्या आदि कर्मकांड के लिए उपयुक्त आसन पर बैठने का विशेष महत्त्व होता है। हमारे महर्षियों के अनुसार जिस स्थान पर प्रभु को बैठाया जाता है, उसे दर्भासन कहते हैं  और जिस पर स्वयं साधक बैठता है, उसे आसन कहते हैं।  योगियों की भाषा में यह शरीर भी आसन है और प्रभु के भजन में इसे समर्पित करना सबसे बड़ी पूजा है।  *जैसा देश वैसा भेष* वाली बात भक्त को अपने इष्ट के समीप पहुंचा देती है । कभी जमीन पर बैठकर पूजा नहीं करनी चाहिए, ऐसा करने से पूजा का पुण्य भूमि को चला जाता है। ब्रह्मांडपुराण तंत्रसार में कहा गया है कि इन कर्मकांडों हेतु भूमि पर बैठने से दुख, पत्थर पर बैठने से रोग, पत्तों पर बैठने से चित्तभ्रम, लकड़ी पर बैठने से दुर्भाग्य, घास-फूस पर बैठने से अपयश, कपड़े पर बैठने से तपस्या में हानि और बांस पर बैठने से दरिद्रता आती है। उल्लेखनीय है कि बिना आसन बिछाए धार्मिक कर्मकांड करने के लिए बैठने से उसमें सिद्धि अर्थात पूर्ण सफलता नहीं मिलती, ऐसे संकेत हमारे धर्मशास्त्र में दिए गए हैं। प्राचीन काल में ऋषि-मुनि काले हिर...

अकूत धन और नवनिधियों के स्वामी कुबेर की कथा

 अकूत धन और नवनिधियों के स्वामी कुबेर  〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ कुबेर धन के अधिपति यानि धन के राजा हैं । पृथ्वीलोक की समस्त धन सम्पदा का एकमात्र उन्हें ही स्वामी बनाया गया है । कुबेर भगवान शिव के परमप्रिय सेवक भी हैं । कुबेर का निवास वटवृक्ष पर बताया गया है । ऐसे वृक्ष घर-आंगन में नहीं होते, गांव के केन्द्र में भी नहीं होते, वे अधिकतर गांव के बाहर या बियाबान में होते हैं ।  उन्हें धन का घड़ा लिए कल्पित किया गया है । कहाँ  लक्ष्मी के धन की मनोरमा, कल्पना, धान की बालियां और पिटारी आदि, कंहा कुबेर का महाजनी रूप । दोनों में कहीं कोई समानता नहीं है । कुबेर का धन अत्यन्त भौतिक और स्थूल है । कुबेर के संबंध में प्रचलित है कि उनके तीन पैर और आठ दांत है । अपनी कुरूपता क लिए वे अति प्रसिद्ध हैं ।  उनकी जो मूर्तियां पाई जाती हैं वे भी अधिकतर स्थूल और बैडोल हैं । शतपथ ब्राहमण में तो इन्हें राक्षस ही कहा गया है । वहां ये चोरों, लुटेरों और ठगों के सरदार के रूप में वर्णित हैं । कुबेर को राक्षस के अलावा कहीं कहीं यक्ष भी कहा गया है । यक्ष धन का रक्षक ही होता है, उसे भोग...

सात्विक भोजन क्यों जरूरी है || सात्विक आहार ||

 सात्विक भोजन क्यों जरूरी है 〰️〰️🔸〰️🔸〰️🔸〰️〰️ कहते है कि जैसा अन्न वैसा मन। हम जो कुछ भी खाते है वैसा ही हमारा बन जाता है, जैसा हमारा मन होगा। अन्न चरित्र निर्माण करता है। इसलिए हम क्या खा रहे है। इस बात का सदा ध्यान रखना चाहिए। प्रकृति से हम जो कुछ भी ग्रहण करते है जैसे भोज्य पदार्थ, पेय पदार्थ, वायु, पांच ज्ञानेन्द्रियों से जो कुछ भी हमारा मन प्राप्त करता है, कर्म इन्द्रियों से हम जो कुछ भी प्राप्त करते है और मन में संगृहीत सूचनाओं के मनन से जैसा भाव मन में उठता है। इन सब से हमारे अन्दर का समीकरण बदलता है और गुण समीकरण में आया परिवर्तन ही हमारे वर्तमान को चलाता है। जैसा गुण समीकरण अन्दर होगा, वैसे विचार मन-बुद्धि में उठेंगे। जैसे विचार उठते है वैसे ही कर्म करते है, जैसे हम कर्म करते है वैसा ही फल हमें मिलता है। भोजन के स्वाद: भोजन के छह स्वाद होते है- 1. मधुर स्वाद : मधुर स्वाद वाले खाद्य पदार्थ सर्वाधिक पुष्टिकर माने जाते है। वे शरीर में उन महत्वपूर्ण विटामीनों एवं खनिज लवणों को ग्रहण करते है, जिसका प्रयोग शर्करा को पचाने के लिए किया जाता है। इस श्रेणी में आने वाले खाद्य पदार्...