रुद्राष्टक स्तोत्र पाठ || श्रीरामचरितमानस- उत्तरकाण्ड || सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Aglio Olio Pasta (अलियो ओलियो पास्ता) रेसिपी

Aglio Olio Pasta (अलियो ओलियो पास्ता) रेसिपी Aglio e Olio एक क्लासिक इटैलियन पास्ता है, जो बहुत कम सामग्री से बनता है — लहसुन, ऑलिव ऑयल और पास्ता। इसका स्वाद सिंपल लेकिन बहुत स्वादिष्ट होता है। सामग्री (2 लोगों के लिए) 200 ग्राम स्पेगेटी या कोई भी पास्ता 5–6 लहसुन की कलियाँ (पतली कटी हुई) 3–4 बड़े चम्मच ऑलिव ऑयल 1 छोटा चम्मच चिली फ्लेक्स नमक स्वादानुसार 1/2 छोटा चम्मच काली मिर्च 2 बड़े चम्मच पास्ता उबालने का पानी थोड़ा सा पार्सले या धनिया (गार्निश के लिए) वैकल्पिक: कद्दूकस किया हुआ चीज़ बनाने की विधि 1. पास्ता उबालें एक बड़े बर्तन में पानी उबालें। उसमें नमक और पास्ता डालें। पास्ता को पैकेट पर दिए समय तक “al dente” होने तक पकाएँ। थोड़ा सा उबला पानी अलग रख लें और बाकी पानी छान दें। 2. लहसुन भूनें पैन में ऑलिव ऑयल गर्म करें। उसमें कटे हुए लहसुन डालें। धीमी आँच पर हल्का गोल्डन होने तक भूनें। ध्यान रखें कि लहसुन जले नहीं। 3. मसाले डालें अब चिली फ्लेक्स और काली मिर्च डालें। 10–15 सेकंड चलाएँ। 4. पास्ता मिलाएँ उबला हुआ पास्ता पैन में डालें। साथ में 2–3 चम्मच पास्ता पानी डालें। अच्छे से टॉस क...

रुद्राष्टक स्तोत्र पाठ || श्रीरामचरितमानस- उत्तरकाण्ड ||

।। श्रीरामचरितमानस- उत्तरकाण्ड ।।

            रुद्राष्टक 

करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि।
बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि।।

भावार्थ-
प्रेम सहित दण्डवत्‌ करके वे ब्राह्मण श्री शिवजी के सामने हाथ जोड़कर मेरी भयंकर गति (दण्ड) का विचार कर गदगद वाणी से विनती करने लगे-

छंद-
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं।
विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं।।

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं।
चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं।।

भावार्थ-
हे मोक्षस्वरूप, विभु, व्यापक, ब्रह्म और वेदस्वरूप, ईशान दिशा के ईश्वर तथा सबके स्वामी श्री शिवजी मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
निजस्वरूप में स्थित (अर्थात्‌ मायादिरहित), (मायिक) गुणों से रहित, भेदरहित, इच्छारहित, चेतन आकाश रूप एवं आकाश को ही वस्त्र रूप में धारण करने वाले दिगम्बर (अथवा आकाश को भी आच्छादित करने वाले) आपको मैं भजता हूँ।

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं।
गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।।

करालं महाकाल कालं कृपालं।
गुणागार संसारपारं नतोऽहं।।

भावार्थ-
निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय (तीनों गुणों से अतीत), वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे, कैलासपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार से परे आप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ।

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं।
मनोभूत कोटि प्रभा श्रीशरीरं।।

स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा।
लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा।।

भावार्थ-
जो हिमाचल के समान गौरवर्ण तथा गंभीर हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है, जिनके सिर पर सुंदर नदी गंगाजी विराजमान हैं, जिनके ललाट पर द्वितीया का चंद्रमा और गले में सर्प सुशोभित है।

चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं।
प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं।।

मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं।
प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि।।

भावार्थ-
जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं, सुंदर भ्रुकुटी और विशाल नेत्र हैं, जो प्रसन्नमुख, नीलकण्ठ और दयालु हैं, सिंह चर्म का वस्त्र धारण किए और मुण्डमाला पहने हैं, उन सबके प्यारे और सबके नाथ (कल्याण करने वाले) श्री शंकरजी को मैं भजता हूँ।

प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं।
अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं।।

त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं।
भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं।।

भावार्थ-
प्रचण्ड (रुद्ररूप), श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मे, करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश वाले, तीनों प्रकार के शूलों (दुःखों) को निर्मूल करने वाले, हाथ में त्रिशूल धारण किए, भाव (प्रेम) के द्वारा प्राप्त होने वाले भवानी के पति श्री शंकरजी को मैं भजता हूँ।

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी।
सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।।

चिदानंद संदोह मोहापहारी।
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।।

भावार्थ-
कलाओं से परे, कल्याणस्वरूप, कल्प का अंत (प्रलय) करने वाले, सज्जनों को सदा आनंद देने वाले, त्रिपुर के शत्रु, सच्चिदानंदघन, मोह को हरने वाले, मन को मथ डालने वाले कामदेव के शत्रु, हे प्रभो! प्रसन्न होइए, प्रसन्न होइए!

न यावद् उमानाथ पादारविंदं।
भजंतीह लोके परे वा नराणां।।

न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं।
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं।।

भावार्थ-
जब तक पार्वती के पति आपके चरणकमलों को मनुष्य नहीं भजते, तब तक उन्हें न तो इहलोक और परलोक में सुख-शांति मिलती है और न उनके तापों का नाश होता है।
अतः हे समस्त जीवों के अंदर (हृदय में) निवास करने वाले हे प्रभो! प्रसन्न होइए!

न जानामि योगं जपं नैव पूजां।
नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं।।

जरा जन्म दुःखोद्य तातप्यमानं।
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो।।

भावार्थ-
मैं न तो योग जानता हूँ, न जप और न पूजा ही।
हे शम्भो! मैं तो सदा-सर्वदा आपको ही नमस्कार करता हूँ।
हे प्रभो! बुढ़ापा तथा जन्म (मृत्यु) के दुःख समूहों से जलते हुए मुझ दुःखी की दुःख से रक्षा कीजिए।
हे ईश्वर! हे शम्भो! मैं आपको नमस्कार करता हूँ।

श्लोक-
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति।।

भावार्थ-
भगवान्‌ रुद्र की स्तुति का यह अष्टक उन शंकरजी की तुष्टि (प्रसन्नता) के लिए ब्राह्मण द्वारा कहा गया।
जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं, उन पर भगवान्‌ शम्भु प्रसन्न होते हैं।


।। हर हर महादेव  ॐ नमः शिवाय ।।

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